Article

मुक्ति….

Posted On April 18, 2017 at 5:54 pm by / No Comments

Like
Like Love Haha Wow Sad Angry
2

शरीर और आत्मा के अलग हो जाने को मुक्ति नही कहा जा सकता. मुक्ति तो शरीर और आत्मा दोनों के एक साथ मिलकर एक ऐसी राह पर चलने से मिलती है जहाँ मोह और माया का जाल नही फैला होता. मुक्त होने के लिए मरने की जरूरत नही पड़ती, बल्कि मुक्त होने के लिए तो जिंदा रहकर बुद्ध के रास्ते पर चलना पड़ता है. बिना रिश्तो-नातो को त्यागे मुक्त होना नामुमकिन है.

जीवन के किसी न किसी मोड़ पर मन में रिश्तो के लिए मोह जाग ही जाता है. ऐसे में अगर जन्म-मरण के बन्धनों से मुक्त होना है तो सब से पहले मन को मुक्त करना होगा. प्रेम, नफरत, ईर्ष्या, दुःख, ख़ुशी, उदासी, हँसी इन सभी भावो से अपने मन को मुक्ति देनी होगी.

शरीर से मुक्त तभी हुआ जा सकता है जब मन खुद के वश में हो, जब मन चाहना छोड़ दे, जब मन किसी की तलाश में न भटके, जब अपने और पराये दोनों एक समान नज़र आने लगे. न कोई करीब न कोई दूर. न कोई अच्छा न कोई बुरा. सब एक जैसे लगने लगे.

रिश्तो की भीड़ भी हमें अंत में अकेलेपन के जंगल में लाकर छोडती है. हर एक रिश्ता अपने-अपने तरीके से एक-दुसरे का फायदा उठाता है और अंत में जब जरूरत खत्म हो जाती है तब अकेला छोड़ देता है. फिर जीवन के किस उद्देश्य को लेकर हम रिश्तो के जाल में फंसते चले जाते हैं? सिर्फ कुछ परम्पराओ को निभाने के लिए. दुनिया जैसे चलती आई है उसे वैसे ही चलाते रहने के लिए? आखिर कब तक ये दुनिया ऐसे ही चलती रहेगी? कब तक परम्पराएँ निभाई जाएँगी दुनिया को जिंदा रखने की? कब तक हम मरते रहेंगे फिर से जन्म लेने के लिए? आखिर कभी न कभी तो रिश्तो के मोह को त्याग कर, माया के मोह को त्याग कर हमें फिर से घास फूस की झोपड़ियो में रहकर अपने जीवन के उद्देश्य को सार्थक करने की और कदम बढाने होंगे.

Like
Like Love Haha Wow Sad Angry
2

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *