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मन की मनमर्जीयां ..।।

Posted On November 7, 2017 at 9:05 pm by / 2 Comments

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यूं तो मन में हजारों बातें चलती रहती हैं, लेकिन जब लिखने बैठो तो ऐसा लगता है जैसे शब्दों के रेगिस्तान में आ गये हो. जहां शब्द-शब्द चुनना बंजर धरती से पानी निकालने के समान लगता है।

एक इंसान के मन में एक दिन में लाखों-करोड़ो ख्याल घूमते हैं. एक टीवी सीरियल था गंगा. जिसमें जब छोटी- सी गंगा से ये सवाल पूछा गया कि सबसे तेज गति किसकी होती है तो उसने बड़ी ही समझदारी से जवाब दिया था कि “मन की गति” सबसे तेज होती है। वास्तव में सच भी तो यही है, मन की गति ही तो सबसे तेज होती है. हम बैठें कहीं ओर होते हैं और हमारा मन कहीं और ही घूम रहा होता है। हम जी कुछ और जिन्दगी रहे होते हैं और हमारा मन किसी और तरह के जीवन की उम्मीद लगाये बैठा रहता है। हम सब कुछ भूलना चाहते हैं और हमारा मन उन्हीं पूरानी यादों के चारो ओर चक्कर काटता रहता है. हम मन को समझाते हैं, मन हम को समझाता है।

यूं तो इस मन से कोई शिकायत नहीं है लेकिन बीती हुई बातों को भी खुद में वर्षो-वर्ष तक समेट कर रखता है ये मन, बस यही बात परेशान करती है। क्यों ऐसा नहीं होता कि जो बीत गया वो मन से एकदम से निकल जाये. कोई याद न रहे जिन्दा मन में। जो गुजर गया समझो खत्म हो गया। जो है समझो वही सब कुछ है।

अगर ऐसा हो जाये तो ये जो हम गुजरी हुई बातों की यादों के सिरो को पकड़कर अतीत के समन्दर में डूबते-तैरते रहते हैं न यह सिलसिला ही खत्म हो जाये।

 

न कोई पुरानी बात याद रहे न मन को कोई तृष्णा हो, न हम को कोई दुख हो…

मन मनमानी करना छोड़ दे तो
मन को सुकुन मिल जाये ..।।

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2 thoughts on “मन की मनमर्जीयां ..।।

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