Meri Diary Se

काश वो होते …. !!!

Posted On January 22, 2017 at 3:35 pm by / 2 Comments

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अपने घर में बैठकर अब ये महसूस नही होता कि मैं घर में बैठा हूँ. मेरा घर अब दीवारों में तब्दील हो गया है जहाँ लोग रहते तो हैं मगर नफरत से. एक-दुसरे के कट्टर दुश्मन. मेरे घर का वो आँगन जो कभी खिल-खिलाता था अब उदास रहने लगा है. वहां अब हँसी नही गूंजती. वहां अब शोर होता है लड़ाइयो का. मेरे घर के आँगन में अब बच्चे नही चहकते वहां अब बड़े रहते हैं जिनके बीच बातें तो होती हैं मगर गालियों के साथ…..

मेरे घर में अब पेड़ भी नही उगते. न फलदार, न बिना फल वाले. हवाएं अब मेरे घर को महकाने नही आती. हाँ आधियाँ जरुर आ जाती हैं. सब कुछ बिखेर देने के लिए…..

मेरा घर अब मुझे मेरा घर नही लगता. बस ईंट-पत्थरो से बना हुआ एक मकान लगता है जहाँ मेरे कुछ अपने रहते हैं. अपने- जो मेरे अपने हैं भी या नही मुझे नही मालूम …..

वो बैठक जो मेरे घर में बनी है अब कूड़ादान हो गयी है. वहां दोपहरें नही कटती. न ही शामें गुजरती हैं वहां अब. लूडो, किताबें, कापियां माँ, राहगीर और हम. सब खो गये हैं न जाने कहाँ. बैठक अब कच्ची मिट्टी से महकती नही है. वो अब खँडहर हो गयी है. हमारे रिश्तो की तरह …..

दीवारों में तब्दील मेरे घर की चीखें अक्सर रातो में मुझे सुनाई देती हैं. मेरी माँ भी आती है ख्वाबो में मेरे रोती हुई, परेशान सी. मेरे घर का चूल्हा सिसकियाँ भरता हुआ नज़र आता है. और वो नल जहाँ सबकी भेंसे नहाती थी, जहाँ हम अपनी बारी के आने तक एक-दुसरे से बात करते थे, हँसते थे, मुस्कुराते थे वो नल भी अब रोज रोता है …..

मेरे घर का हर एक कौना अपने पूर्वजो को याद करके रोज ये सोचता है. वो होते तो शायद ये घर दीवारों में तब्दील न हो पाता. वो होते तो शायद स्टोररूम में तब्दील हुई घर की बैठक यूँ उदास न होती. वो होते तो हवाएं अब भी मेरे घर को महकाती, वो होते तो शायद आँगन में अब भी क्रिकेट मैच खेले जाते. वो होते तो मेरा घर बैगाना सा नही लगता. वो होते तो शायद अपने ही दुश्मन नही बनते …..

काश वो होते …. !!!

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