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जहां सब कुछ है भी और कुछ भी नही है.

Posted On October 6, 2017 at 12:23 am by / No Comments

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जब आपके आसपास कोई नही होता आपके मन की बात समझने वाला तब बस एक ही तरीका बाकि रह जाता है मन के बोझ को कम करने का और वो है कोरे पन्नों के साथ अपनी बात को शेयर कर लेना. कोई आपकी बात समझें या नही समझें ये कोरे पन्नें और कलम जरूर समझते हैं.

दिल का दोष नहीं है ये, ये किस्मत का दोष है, या फिर इसे नसीब का दोष भी कहा जा सकता है, कहने को तो हम कुछ भी कह सकते हैं लेकिन कहें क्या, जबकि कहने का भी कुछ खास फायदा नहीं है, चुप रहना सबसे अच्छा है, न किसी से कुछ कहेंगे न ही कुछ कहने की उम्मीद मन में जागेगी. जो चल रहा है मन में चलने दो, जो जल रहा है अन्दर जलने दो, क्यों बुझाना चाहते हो, ये जो जल रहा है न अन्दर कुछ यही तो जिन्दा रहने के निशां हैं, जिस दिन अन्दर की ये आग दहकना छोड़ देगी उस दिन समझ लेना तुममें कुछ नहीं बचा अब जिसके भरोसे जिन्दा रह सको. कुछ खो देना, कुछ पा लेना ये दोनों एक वक्त आने के बाद खुद ही समाप्त हो जाते हैं, एक वक्त के बाद न कुछ पाने का मन होता है न ही कुछ खो देने का. न चलने का मन होता है न ही रुकने का. न उम्मीद का दामन थामें आगे बढ़ने का मन होता है और न ही नाउम्मीद हो जाने का. जीवन एक वक्त आने पर संतुलित हो जाना चाहता है. रोज-रोज के भागने से थक जाता है, जीवन में एक ठहराव चाहता है. एक ऐसा ठहराव जो मन को शांति दे, जो जलते हुए तो ठंड़क दे सके.
एक ऐसे ही ठहराव की तलाश में हूं मैं आजकल, एक ऐसा ठहराव जिसके आने पर मन भागना छोड़ दे, जो मेरे मन की ज्वाला को शांत कर दे, न मुझे दुख महसूस हो न सुख. एक ऐसी अवस्था जहां सब कुछ अच्छा हो और सब कुछ बुरा हो. जहां न जीवन से उम्मीदें हों न ही टूटी हुई आशाऐं.


जीवन की ऐसी ही अवस्था का आगमन हो चुका है मेरे जीवन में. जहां सब कुछ है भी और कुछ भी नही है.

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