Meri Diary Se

बचपन कभी-कभी जिंदा होने लगता है…

Posted On January 23, 2017 at 3:05 pm by / 2 Comments

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वो मिट्टी जिसमे हम जन्म लेते हैं उसकी महक हमारी सांसो में बसी होती है. हम चाहे दुनिया के किसी भी कौने में रहें हमारी जन्मभूमि की महक हमारे साथ-साथ होती है. हम जब भी साँस लेते हैं महसूस करते हैं अपनी मिट्टी को अपने करीब. खेतो में चलने वाला हल कहीं खो गया हो बेशक मगर वो मिट्टी जहाँ कल फसल उगती थी वहां आज भी फसल उगती है. हाँ अब बैल नही जोते जाते खेतो में मगर मिट्टी की महक आज भी वैसी की वैसी ही है.

सरसों के पीले फूलो से सजे खेत अब बस दूर से देख पाते हैं. कभी बस में बैठकर, कभी ट्रेन में. मगर दूर से भी उनकी खुशबु उतनी ही अच्छी लगती है जितनी बचपन में लगा करती थी तब जब हम सरसों के खेतो में छुपम-छुपायी खेला करते थे ….. 

खेत में उगे हुए पेड़ो के पत्ते जब हवा की गोद में बैठकर झूलते हैं तो उनसे आने वाली झर-झर की आवाजें अब भी गूंजती हैं कानो में. बस अब सब कुछ आंख बंद कर के महसूस करना पड़ता है. गन्ने के रस में डूबा हुआ बचपन अब भी मुहं मीठा करा जाता है. जनवरी की सर्दी में कपकंपाती हुई सुबह आज भी ढूढ़ती है वो फूस जो हर शाम ले आया करते थे खेतो से, आने वाली हर अगली सुबह को गर्म करने के लिए.

गर्मियों की वो आधी गुजरी हुई रातें जो गेंहू की कटाई में गुजर जाया करती थी याद आती हैं अब. उस घने अँधेरे मे, सुनसान सडको पर भी डर नही लगता था तब. माँ साथ होती थी शायद इसलिए. वो आसमान में कड़कती बिजलियाँ और हमारा डर कर पेड़ो के नीचे छुप जाना आज भी आँखों के सामने आ जाता है तब जब भी कभी हम सुनते हैं आवाजें आसमां में कड़कती बिजलियों की.

ट्यूबवेल से निकला वो ठंडा पानी जो फसलो को जिंदगी से भर देता था और हमारे मन को शीतलता से अब उतना ठंडा नही रहा. अब पानी भी रेडीमेड सा हो गया है. जो पानी है तो मगर उसमे वो शीतलता नही है जो पहले हुआ करती थी. शायद फसलो के मर जाने का एक कारण ये भी हो ….

आग में भुने हुए मटर के पेड़ो की वो राख अब भी कभी-कभी खुशबु बनकर महसूस होने लगती है. स्कूल के सामने सूखी हुई नहर की वो रेत जो अक्सर हमें घंटो तक खेलने के लिए मजबूर कर देती थी अब भी कभी-कभी हथेलियों में लगी हुई महसूस होती है. और वो छोटी-छोटी सी क्यारियां जो स्कूल में मिलती थी हमें छोटी-छोटी फसलें उगाने के लिए उनकी मिट्टी अब भी कई बार लगता है जैसे बुला रही हों.

मेथी, पालक, हरा धनिया वो जो हम घर के पीछे छोटी-छोटी क्यारियां बनाकर उगा लिया करते थे वो अब पूरी तरह से खो गये हैं. हाँ मगर उनकी खुशबु आज भी घुल जाती है सांसो में कभी-कभी.

बचपन कभी-कभी जिंदा होने लगता है. गुजरा हुआ वक़्त आँखों के सामने घुमने लगता है. और कमाल देखिये ऐसा अक्सर तब होता है जब आँखे बिलकुल बंद होती हैं ……!!

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