Hindi Poem (हिंदी कविता)

अख़बार खामोश है ….

Posted On May 25, 2016 at 4:30 pm by / No Comments

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अख़बार खामोश है  ……                                                                 
बहुत चुपचाप सा रहने लगा है आजकल
न कुछ कहता है, न कुछ सुनता है
न किसी बात पर कोई रियेक्ट करता है
बस एक कौने में बैठा रहता है
अख़बार खामोश है …..

एक दिन रात के सन्नाटे में
सुनी सिसकियाँ मैंने
एक कौने में बैठा अख़बार रो रहा था
मैंने जाकर देखा
लगाया जो गले
फूट-फूट कर रोने लगा
लगता था उसके दिल में भी
बहुत सालो का दर्द जमा था …

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मैंने पूछा क्या हुआ
रो क्यों रहे हो
तुम आजकल इतने
चुपचाप क्यों रहते हो
अख़बार संभला कुछ और फिर बोला
मैं अब छापना नही चाहता
कोरा रहना चाहता हूँ
खाली एक दम …

अख़बार के शब्दों ने मुझे
शून्य सा कर दिया था
अख़बार छपना नही चाहता
हैरान थी मैं …
मेरे चेहरे पर
हैरानी के भाव पढ़ चूका था वो
मैं कुछ कहती थी इससे पहले
अपनी बात कहने लगा था वो …

हाँ मैं छापना नही चाहता
थक चूका हूँ अब
खुद के दामन पर दाग सहते-सहते
था उम्मीद में कि कभी तो कहीं तो
आएगा ऐसा वक़्त जब ख़ुशी के गीत गुन-गुनाऊंगा
दामन को अपने तरक्की और उम्मीद के
सितारों से सजाऊंगा …

मगर अब हवा कुछ और कहती है
मेरे सीने में दफन हर एक खबर
नफरत के लाल रंग में नहाई रहती है ….
लुटती हुई इज्जतो का मैं
गवाह बनता हूँ
इश्क और दोस्ती की बेवफाई से
खत्म हुई जिंदगियो को
अपने दामन में सहेजता हूँ
कभी गौर से देखोगे जो मुझे खोलकर तुम
मेरे लिबास पर खून के धब्बे ही पाओगे …

दम अब घुटने लगा है मेरा
सियासत के जाल में फंसकर
मैं अब छपना नही चाहता
कोरा रहना चाहता हूँ
गुनाहों कर गवाह नही बनना चाहता
ख़ुशी का गीत भी न बन सकूँ तो
खामोश रहना चाहता हूँ …..

मैं छपना नही चाहता ….!!!

 

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